लोकतंत्र में जनता की आवाज ही सबसे अव्वल
विधानसभा मध्य प्रदेश में लोकतंत्र का सबसे बड़ा मंच है। इसे सत्ता और विपक्ष के बीच बहस का स्थान भी नहीं कहा जा सकता। बल्कि, प्रदेश की साढ़े 7 करोड़ जनता की समस्याओं, उम्मीदों और उनके संवैधानिक अधिकारों की आवाज उठाने का यह लोकतंत्र का पवित्र मंदिर भी है। प्रदेश में नेता प्रतिपक्ष के रूप में मेरी जिम्मेदारी केवल सरकार से सवाल पूछना ही नहीं, उन लोगों की लड़ाई लड़ना भी है जिनकी आवाज अक्सर सत्ता के गलियारों तक नहीं पहुंच पाती। आदिवासियों के अधिकार हों, किसानों की समस्याएं हों, युवाओं का भविष्य हो, अफसरशाही पर लगाम कसना हो या कानून व्यवस्था का सवाल ही क्यों न हो। विपक्ष का धर्म है कि वह सरकार से जवाब मांगे, उन्हें कटघरे में खड़ा करे और जनता के हितों की रक्षा करे। विधानसभा के पिछले बजट सत्र में सत्ताधारी पार्टी के जवाबदार मंत्री ने जो कुछ किया, उसने फिर साबित कर दिया कि जब विपक्ष मजबूती से जनता के मुद्दे उठाता है, तब सत्ता पक्ष असहज हो जाता है। ऐसी स्थिति में उनकी भाषा और व्यवहार मर्यादा की सीमा लांघ जाता है। सदन में मेरे द्वारा प्रदेश के महत्वपूर्ण मुद्दों पर सरकार से जवाब मांगे जा रहे थे। लेकिन, लोकतांत्रिक संवाद और जवाबदेही की भावना दिखाने के बजाय सरकार के वरिष्ठ मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने व्यक्तिगत टिप्पणी करते हुए 'औकात' जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया। यह केवल मेरे लिए नहीं, बल्कि उस जनता का भी अपमान है, जिसने विपक्ष को अपनी आवाज बनने की जिम्मेदारी दी। मैं अपनी बात स्पष्ट करना चाहता हूं कि मेरी 'औकात' किसी पद, सत्ता या व्यक्तिगत प्रभाव से तय नहीं होती। मेरी असल ताकत मध्य प्रदेश की जनता का वह भरोसा है, जो मुझ पर किया गया। प्रदेश में मैं उस किसान की आवाज हूं, जो खेत में कठिन परिश्रम के बाद अपनी फसल का उचित मूल्य चाहता है। मैं उस आदिवासी परिवार की आवाज हूं जो अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करते हुए बरसों से अभाव में जी रहा है। मैं उस युवा बेरोजगार उम्मीद हूं जो शिक्षा के बाद अपना बेहतर भविष्य चाहता है। ऐसी जिम्मेदारियों के बीच यदि जनता के सवाल उठाना किसी को असहज करता है, तो यह लोकतंत्र की नहीं, सत्ता के अहंकार की समस्या है, जो अब मद में बदल चुका है। संवैधानिक व्यवस्थाओं ने तय किया है कि लोकतंत्र में विपक्ष दुश्मन नहीं होता, बल्कि सत्ता व्यवस्था को संतुलित रखने वाली सबसे महत्वपूर्ण ताकत होता है। वह एक निगरानी व्यवस्था का भी हिस्सा है,जो सरकार को जिम्मेदारी की राह पर चलने के लिए मजबूर करता है। मजबूत प्रतिपक्ष ही सरकार को जवाबदेह बनाता है, गलत नीतियों को चुनौती देता है और जनता के हितों की रक्षा करता है। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि भाजपा सरकार के कुछ मंत्री विपक्ष की आवाज को लोकतांत्रिक तरीके से सुनने के बजाय व्यक्तिगत हमलों और अहंकारी भाषा का सहारा लेते हैं। यह आचरण न केवल विधानसभा की गरिमा को ठेस पहुंचाता है, बल्कि जनता के विश्वास को भी कमजोर करता है। कैलाश विजयवर्गीय जैसे वरिष्ठ मंत्री से अपेक्षा की जाती है कि वे अपने अनुभव और पद की मर्यादा के अनुरूप व्यवहार करें। लेकिन, सदन में जिस तरह की भाषा का इस्तेमाल किया गया, वह अत्यंत गैर जिम्मेदाराना और दुर्भाग्यपूर्ण था। लोकतंत्र में असहमति स्वाभाविक है, लेकिन संवाद की गरिमा बनाए रखना हर जनप्रतिनिधि की जिम्मेदारी भी है। सत्ता का अहंकार कभी स्थायी नहीं होता, लेकिन जनता की आवाज हमेशा सबसे बड़ी ताकत रहती है। मैं प्रदेश की जनता को विश्वास दिलाना चाहता हूं कि विपक्ष उनके विश्वास से कभी पीछे नहीं हटेगा। चाहे कितनी भी व्यक्तिगत टिप्पणियां हों या दबाव बनाया जाए, जनता के अधिकारों और सम्मान की लड़ाई पूरी मजबूती से जारी रहेगी। लोकतंत्र में सवाल पूछना अपराध नहीं, बल्कि जनता के प्रति हमारी जिम्मेदारी है और इससे हम कभी पीछे नहीं हटेंगे।